आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस - जोखिम से भरा है नैतिकता का पालन ? [Artificial Intelligence - Is It Risky To Follow Ethics?]
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस - जोखिम से भरा है नैतिकता का पालन ?
[Artificial Intelligence - Is It Risky To Follow Ethics?
क्या है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस / What is artificial intelligence
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस [कृतिम
बुद्धिमत्ता ] जिसे संक्षिप्त रूप में आज ए॰आई कहा जाता है । ए॰आई
एक समस्या निवारण साफ्टवेयर है जो कम्प्यूटर में संरक्षित विशाल डेटा समूहों को
सूचीबद्ध करते हुए, त्वरित मांग के अनुसार विभिन्न
सर्च इंजिन [ जैसे गूगल सर्च आदि ] से परिणाम को एकत्र कर मनचाहे विश्लेषण को
सम्पन्न करने में काम आता है । यह परिणाम पहले से तय विभिन्न कार्यों को पूरी
शुद्धता के साथ करने में वैज्ञानिकों या खोजकर्ताओं को मदद करता है । आर्टिफिशियल
इंटेलिजेंस वस्तुतः मानवीय बुद्धि विश्लेषण क्षमता से हजारों गुना तेजी के साथ काम
करता है जिससे खोजकर्ताओं की समय और खोज की लागत लगभग शून्य मानी जा सकती है ।
क्या है एथिकल प्रयोग ? / What is ethical use?
बात आती
है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का एथिकल प्रयोग क्या है । एथिकल प्रयोग यानि नैतिकता
का पालन आज एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है । इसको आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं । यदि आप ए॰आई
के माध्यम से संसार के सबसे बड़े नेता को खोजते हैं तो इसके जवाब में ए॰आई जो परिणाम आपके सामने लेकर
आता है वह निश्चित रूप से विश्व के बड़े नेताओं की सूची होती है । लेकिन वे सभी
पुरुष वर्ग से होते हैं , उनमें एक भी महिला नेता का नाम
नहीं दिखाई पड़ता है । इसी को नैतिकता के विरुद्ध माना जा रहा है । क्यों कि यह ए॰आई
द्वारा लिंगीय असमानता के पूर्वगृह से
ग्रसित खोज परिणाम है । वस्तुतः यह कम्प्यूटर में संरक्षित पहले से तय मानवीय
विचारों या चलन के एक बड़े डेटा बेस की कमियाँ हैं जो ए॰आई के परिणामों को प्रभावित
करती है ।
दूसरी तरफ जन सामान्य के लिए ए॰आई की उपलब्धता असामाजिक तत्वों के द्वारा दुर्पयोग की अतिसंभवनाओं को देखते हुए चिंता का विषय है । यह उस समय और विध्वंशक हो जाता है जब शत्रु देश हमारी सामरिक और आर्थिक डेटा बेस में सेंध लगाने को स्वतंत्र दिखे । ए॰आई से प्राप्त परिणामों पर आगे की खोज को जारी रखने में खोजकर्ताओं , वैज्ञानिकों और सरकारों को उक्त प्रकार की तमाम बातों और बिन्दुओं को चिन्हित करना होगा जिससे मानवता के मूल सिद्धांतो , पर्यावरण के मूल नियमो की अवहेलना का शून्य प्रतिशत की गुंजाइश भी संभव न हो । ऐसा माना जा रहा है कि यदि अभी से इस पर कोई अंकुश , रुकावट या बाधा खड़ी नहीं हुई तब बहुत देर हो सकती है । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का एथिकल प्रयोग ही मानवता के लिए होने वाले बड़े जोखिम को कम कर सकता है ।
कोरोना कनेक्सन और इसका इतिहास / Corona Connection and its history
आपको
याद होगा कि मैं कोरोना आपदा के दौरान लगातार कोरोना की खोज पूर्ण और ताजा
पत्रिकारिता में संलग्न रहा था । गौरतलब है कि कोरोना वैश्विक आपदा के शुरुआती दौर
में अमेरिका और यूरोप के अन्य देशों में मौत के आंकड़े अचानक बढ़ गए और समस्त मेडिकल
व्यवस्था ध्वस्त हो गयी थी । उन दिनों शवों को दफनाने के लिए ताबूत तथा कब्रिस्तान
की कमी पड़ने लगी थी । यह फरवरी 2020 का महिना था । विश्व स्वस्थ्य संगठन की देख
रेख में कोरोना वैक्सीन के विकास और उसके परीक्षण के बाद उसके अति शीघ्र मानवीय
उपचार हेतु उपलब्धता पर विश्व के बड़े शोधकर्ताओं के बीच तकनीकी जंग छिड़ गयी ।
सैद्धान्तिक रूप से किसी भी वैक्सीन के विकास, परीक्षण और
अद्योगिक उत्पादन हेतु लाइसेन्स आदि में 8-10 वर्ष लगता है,
यह मानकर मानवीय अधिकारों की पक्षधर संस्थाएं वैश्विक स्तर पर चिंतित थीं । तभी
युनेस्को को अपने समर्थन में लेते हुए विश्व के उच्चतम वैज्ञानिकों ने इस समय को
कमतर करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस [कृतिम बुद्धिमत्ता] की मदद ली और
रिकार्ड 8 से 12 महीने के भीतर कोरोना के लिए एंटी वैक्सीन जन सामान्य को उपलब्ध
कराने का बड़ा काम मानवता को बचाने में हो सका । ए॰आई का कोरोना कनेक्सन आज एक ताजा
उदाहरण है जिसके द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के एथिकल प्रयोग को समझा जा सकता
है ।
अगर इतिहास की बात करें तो यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की खुली चर्चा कोरोना वैश्विक आपदा के बाद प्रकाश में आई है लेकिन तकनीकी और आई॰टी क्षेत्र में लंबे प्रोफेशल अनुभव से मैं यह कह सकता हूँ कि छुट पुट रूप से अमरीका , इजरायल ,रूस , चाइना तथा जर्मनी ए॰आई का उपयोग एक दशक यानि 2010 से करते आ रहें हैं । याद कीजिये यह वह समय था जब भारत सेल्यूलर मोबाइल की दुनिया में 2जी टेक्नॉलाजी से 3जी टेक्नॉलाजी की ओर अग्रसर हो रहा था ।
उपसंहार और अंत में क्या सोचते हैं इससे जुड़े
जिम्मेदार /
विश्व
स्वास्थ्य के साथ ग्लोबल वार्मिंग ,पर्यावरण , अन्तरिक्ष ,सामरिक , आर्थिक
तथा कला जैसे अनगिनत क्षेत्रों में ए॰आई का बड़ा उपयोग पहले से किया जा रहा है । सरल
शब्दों में व्यक्त करें तो हर वो क्षेत्र जहां मानवीय खोज और मानव के हाथ होने
वाले कठिनतम विश्लेषण का रास्ता बंद होता है वहाँ यह कृतिम बुद्धिमत्ता कारगर और
विश्वसनीय परिणामों के साथ तत्पर खड़ी हो जाती है । एक तरफ मानव समाज में इसके तमाम
उपयोग हैं वहीं दूसरी तरफ इसके बेजा प्रयोग से मानवता के संहार का रास्ता भी खुलता
नजर आता है जब जेनेटिक फेर बदल से वनस्पतियाँ और मानवीयता के व्यवहार को बदलना
संभव हो गया है ।
विगत
दिवस गुरुवार, 3 अगस्त, 2023 को केंद्रीय
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने नई दिल्ली में
संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक,
2023 पेश किया है । यह विधेयक परोक्ष में ए॰आई की तरफ जा रहे कदम
हैं । इसमें डेटा संरक्षण कानून का प्रस्ताव है जिसके उल्लंघन के लिए जुर्माना
बढ़ाते हुए, कुछ अन्य देशों में भारत के व्यक्तिगत डेटा के
हस्तांतरण और भंडारण की अनुमति देता है। यह एक तरफ सरकार की नीतिगत वैश्विक खुलेपन
और गंभीरता का परिचायक है। यह सरकार की युनेस्को से जुड़ी प्रतिबद्धता का परिचायक
है । अवगत हो कि युनेस्को ने 50 देशों में भारत को भी शामिल किया है जहां वह देशों
को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस [कृतिम बुद्धिमत्ता] से जुड़ी नैतिकता के पालन हेतु उनको
खुद की पालसी को डिजाइन करने में मदद करेगा ।
-
अवधेश सिंह [
लेखक, दूरसंचार विभाग के अंतर्गत सूचना तकनीक, कंप्यूटरी करण, सेल्यूलर मोबाइल स्वीचिंग विधा के
विशेषज्ञ रहे है ] [9450213555]



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें